अरस्तू के राजनैतिक सिद्धान्त | अरस्तू का नगर राज्य | Aristotle

हैलो दोस्तो! हम अब जानेंगे (Aristotle) अरस्तू के राजनैतिक सिद्धान्त क्या थे, वो कैसे राज्य की संकल्पना करते थे, उनके लिए राज्य सत्ता क्या थी और नगर राज्य से उनका क्या तात्पर्य था, यह सब हम इस पोस्ट से जानेंगे आसान शब्दो मे-  

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अरस्तू का नगर राज्य

अरस्तू (Aristotle) कहते है कि मनुष्य अकेले रहते हुये अपनी आवश्यकताओ की पूर्ति नहीं कर सकता है, मनुष्य एक सामाजिक और राजनैतिक प्राणी है जो राज्य रूपी एक शरीर का अंग है, अरस्तू यह मानते थे कि कोई भी मनुष्य अकेले अपनी सारी जरूरते पूरी नहीं कर सकता उसे अपनी जरूरते पूरी करने के लिए अपने राज्य और राज्य कि व्यवस्था पर निर्भर होना ही होता है, मनुष्य केवल अपनी प्राथमिक जरूरत पूरी कर सकता है अन्य जरूरतों के लिए राज्य पर निर्भर होना होता है, राज्य ही हमे शिक्षा, स्वास्थ और सुरक्षा प्रदान करती है जिससे एक नैतिक और उत्तम जीवन व्यतीत किया जा सकता है, जो हमारे वर्तमान मे आज व्यवस्था लागू है इसकी नीव अरस्तू ने पहले ही रख दी थी ।

 स्टेटमेंट

शरीर का कोई अंग अलग हो जाए तो उसका अपना कोई अस्तित्व नहीं और शरीर के सभी अंग अलग हो जाए तो उस शरीर का भी कोई अपना अस्तित्व नहीं । 

राज्य है तो व्यक्ति है, राज्य मनुष्य का ही विशाल रूप है, राज्य की संस्थाए राज्य का निर्माण करती है और व्यक्ति से पहले राज्य आता है ।

व्यक्ति का अपना कोई अस्तित्व नहीं कुटुंब (परिवार) का अस्तित्व है ।

राज्य का उद्देश्य केवल अपराधो को रोकना नहीं बल्कि नागरिकों को पूरा नैतिक जीवन का आस्वासन देना है तथा उनके जीवन को श्रेष्ठ बनाते हुये उन्हे आत्म निर्भरता की ओर बढ़ाना है ।

मनुष्य का उद्देश्य नैतिक और आनंद पूर्ण जीवन बिताना है और राज्य ऐसे जीवन को संभव बनाने के लिए विद्यमान है और इस प्रकार राज्य स्वयं मे एक नैतिक संस्था है, नैतिक तथा सद्गुणी जीवन का निर्माण करना राज्य का लक्ष्य है ।

नगर राज्य की संस्था

  • परिवार
  • ग्राम
  • नगर राज्य

परिवार – परिवार राज्य की पहली और सबसे छोटी संस्था है कुछ व्यक्तियों से मिलकर ही एक परिवार बनता है और परिवार ही एक व्यक्ति की प्राथमिक आवश्यकताओं की पूर्ति करता है, जैसे- भोजन, निवास और एक नाम जिससे वह व्यक्ति जाना जाता है ।

ग्राम – जब कई परिवार किसी एक स्थान पर साथ जीवन व्यतीत करते है तो वह स्वतः ही एक संस्था का रूप ले लेती है, वहाँ कई परिवार एक साथ मिलकर कई धार्मिक उत्सव भी मनाते है और कुछ रीति रिवाज बनाते है ताकि वह अर्थ पूर्ण जीवन बिता सके ।

नगर राज्य – नगर राज्य से अरस्तू का कहना है कि जब परिवार बनते है और कई परिवारों मे एक ग्राम का निर्माण होता है, उसी प्रकार कई ग्रामो से मिलकर एक नगर राज्य बनता है और नगर राज्य ही व्यक्ति का अंतिम व श्रेष्ठ समुदाय होता है और नगर राज्य का यह दायित्व होता है, जिन आवश्यकताओ की पूर्ति परिवार और ग्राम से नहीं हो पाती उनकी पूर्ति राज्य करता है, राज्य ही सुरक्षा प्रदान करता है और साथ ही बौद्धिक जरूरते राज्य से ही पूरी होती है जिससे मनुष्य एक नैतिक और आनंद पूर्ण जीवन व्यतीत कर पाता है ।

उपर्युक्त दशाओ के आधार पर अरस्तू ने कहा है कि नगर राज्य मनुष्यो का अंतिम व श्रेष्ठतम समुदाय है यही मनुष्य को पूर्ण जीवन बिताने मे सहायक होता है ।

अरस्तू के राज्य की विशेषता

  • राज्य एक प्राकृतिक संस्था है ।

विवेकशील मनुष्य बुद्धि द्वारा अपने हित मे वृद्धि करना अपना नैतिक दायित्व मानता है और इसका हित राज्य मे ही पूरा हो सकता है, अतः मनुष्य राज्य के नियमो का पालन अपने हित मे वृद्धि करना अपना परम कर्तव्य मानता है, राज्य प्राकृतिक संस्था इस बात से भी स्पष्ट है कि इसका विकास धीरे धीरे स्वाभाविक रूप से हुआ है, राज्य मे मनुष्य को पशुओ से अलग करने वाली बौद्धिक गुणो का विकास करने का अवसर मिलता है इस प्रकार राज्य प्राकृतिक है ।

  • नगर राज्य समाज का श्रेष्ठ सामाजिक संगठन है

नगर राज्य मनुष्यो का सर्वोत्तम समुदाय है क्योकि यह सामाजिक विकास का चरम रूप है, इसमे जितनी मनुष्य की आवश्यकताए पूरी होती है उतनी किसी समुदाय मे नहीं होती, अर्थात परिवार तथा ग्राम कुछ आवश्यताए ही पूरी करते है किन्तु मनुष्य की समस्त बौद्धिक आवश्यकताए नगर राज्य मे ही पूरी हो सकती है ।

  • राज्य का आत्म निर्भर होना

अरस्तू कहते है राज्य अपने स्वरूप के अनुसार अपनी समस्त आवश्यकताओ की स्वतः ही पूर्ति करने मे सक्षम होना चाहिए, मनुष्य की जिन आवश्यकताओ की पूर्ति परिवार व ग्राम से न हो उनकी पूर्ति करने मे राज्य की आत्म निर्भरता ही उसे श्रेष्ठ बनाती है ।

  • राज्य पूर्व वर्ती है

व्यक्तियों से मिलकर राज्य का निर्माण होता है यह कथन ऐतिहासिक दृष्टि कोण से तो सही है परंतु मनोबैज्ञानिक दृष्टि कोण से अरस्तू राज्य को व्यक्ति से पूर्व वर्ती मानता है ।

  • राज्य की सत्ता उत्तम जीवन के लिये है न कि जीवन व्यतीत करने के लिये

 राज्य केवल एक बड़ी जनसंख्या कि भीड़ नहीं है, राज्य वो है जो व्यक्ति के आवश्यकताओ को पूर्ण करने मे सक्षम हो ।

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अरस्तू के राजनैतिक सिद्धान्त का अर्थ अगर हमे संक्षिप्त मे समझना है तो हम यह कह सकते है कि अरस्तू का नगर राज्य और उस राज्य मे रह रहा हर व्यक्ति एक दूसरे के पूरक है, हर व्यक्ति कि पहचान उसके राज्य से होती है और बौद्धिक आवश्यकताए भी राज्य द्वारा ही पूर्ण होती है, एक राज्य का कार्य सिर्फ सत्ता बनाए रखना नहीं बल्कि राज्य मे रह रहे हर नागरिक को एक उत्तम और आनंद पूर्ण जीवन हो ऐसी व्यवस्था स्थापित करना राज्य का ही दायित्व है। व्यक्ति भी अपनी सुरक्षा और आवश्यकताओ कि पूर्ति हेतु राज्य के बनाये गये नियमो का पालन स्वतः ही करते है ।

अरस्तू के राजनैतिक सिद्धान्त की कई आलोचनाए भी हुई और वर्तमान समय मे कुछ बदलाव भी किए गये लेकिन उनके द्वारा जिस सोच और नीति कि शुरुआत की गई थी वो आज भी दुनिया भर मे कायम है ।

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